अयोध्याकाण्ड — परिचय
श्री रामचरितमानस का द्वितीय काण्ड "अयोध्याकाण्ड" करुणा, त्याग और भक्ति का सर्वोत्तम काव्य है। यह काण्ड उस समय की कथा कहता है जब भगवान राम के राज्याभिषेक की तैयारी हो रही थी, परन्तु नियति ने कुछ और ही रच रखा था।
इस काण्ड में मुख्यतः तीन वंदनीय त्याग चित्रित हैं — श्री राम का चौदह वर्ष का वनवास, भरत का सिंहासन त्याग और माता कैकेयी का पश्चाताप। यह काण्ड पुत्र-धर्म, भ्रातृ-प्रेम और राजनीतिक दायित्व का अद्भुत चित्रण करता है।
जिन्ह कें रही भावना जैसी।
प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥
अर्थ : जिनकी जैसी भावना थी, उन्होंने प्रभु की मूर्ति वैसी ही देखी। यह दोहा बताता है कि ईश्वर की अनुभूति भक्त की भावना पर निर्भर करती है।
अयोध्याकाण्ड में तुलसीदास जी ने अत्यंत करुणाजनक और भावपूर्ण प्रसंगों का वर्णन किया है। राजा दशरथ का विलाप, माता कौसल्या का दर्द, निषादराज की भक्ति, केवट का प्रेम और भरत की विरह-वेदना — ये सभी मानव हृदय को द्रवित कर देते हैं।
कथा संक्षेप
अयोध्याकाण्ड में एक के बाद एक ऐसे प्रसंग हैं जो हृदय को भिगो देते हैं और जीवन के उच्चतम मूल्यों को सामने रखते हैं —
राजा दशरथ ने महर्षि वशिष्ठ से परामर्श कर श्री राम के राज्याभिषेक का निर्णय लिया। पूरी अयोध्या में उत्सव का माहौल था। सभी प्रजाजन प्रसन्न थे।
दासी मंथरा ने कैकेयी के मन में विष भर दिया। उसने राम के राज्याभिषेक को कैकेयी और भरत के लिए खतरा बताया। कैकेयी मंथरा की बातों में आ गईं।
कैकेयी ने कोप भवन में जाकर राजा दशरथ से पूर्व में दिए गए दो वरों की माँग की — पहला वर, भरत को राज्य और दूसरा वर, राम को चौदह वर्ष का वनवास। दशरथ स्तब्ध रह गए।
श्री राम ने पिता का वचन और माता कैकेयी की इच्छा पूरी करने के लिए हँसते-हँसते वनवास स्वीकार किया। उनके चेहरे पर कोई दुःख नहीं था — यही मर्यादा पुरुषोत्तम का गुण है।
माता सीता ने कहा — "पति के बिना पत्नी का कोई घर नहीं।" वे भी वन जाने की अनुमति माँगी। लक्ष्मण ने भी भाई-भाभी की सेवा में वन जाने का निश्चय किया। तीनों ने वल्कल धारण किए।
राम के वन जाने के बाद राजा दशरथ शोक में डूब गए। उन्हें श्रवण कुमार को दिया गया श्राप याद आया। अंततः "हा राम! हा राम!" कहते हुए उनका प्राणांत हो गया।
निषादराज गुह ने राम का स्वागत किया और उनकी सेवा की। गंगा पार करते समय केवट ने राम के चरण धोकर ही नाव में बैठाने की इच्छा जताई — यह भक्ति का अनूठा उदाहरण है।
महर्षि भरद्वाज के आश्रम में रात्रि विश्राम के बाद श्री राम, सीता और लक्ष्मण चित्रकूट पहुँचे। वहाँ उन्होंने पर्णकुटी बनाई और वास किया।
भरत ननिहाल से लौटे तो अयोध्या की दुर्दशा देखकर विलाप किया। माता कैकेयी को धिक्कारा और राम को वापस लाने चित्रकूट गए। भरत-राम मिलन का यह प्रसंग अत्यंत भावुक है।
श्री राम ने राज्य लौटने से मना किया और पिता का वचन पूरा करने का संकल्प दोहराया। भरत ने राम की खड़ाऊँ लेकर अयोध्या वापस आए और नंदिग्राम में रहकर राज्य-संचालन किया।
मुख्य चौपाइयाँ और दोहे
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी।
सो नृपु अवसि नरक अधिकारी॥
अर्थ : जिस राजा के राज्य में प्रजा दुखी रहती है, वह राजा निश्चित ही नरक का अधिकारी है। यह राज-धर्म का सर्वोच्च सूत्र है।
नाथ सकल सुख साथ तुम्हारे।
सहित दुख बन मोहि सुखारे॥
जनम अवधि हम जब तुम्ह देखा।
तबहिं हमार सफल भव लेखा॥
अर्थ : हे नाथ! सारे सुख तुम्हारे साथ हैं। वन में दुःख सहते हुए भी तुम्हारे साथ रहने में मुझे सुख है। जब से मैंने तुम्हें देखा है, तब से मेरा जन्म सफल हो गया।
पद नख निरखि देवसरि हरषि।
सुरसरि देखि परम सुख उपजि।
कहइ कृपाल सुहृद तुम्हारे।
चरण अनुज सब भाँति हमारे॥
अर्थ : केवट ने भगवान राम के चरण देखकर प्रसन्नता अनुभव की। उसने कहा — हे कृपालु! आपके चरण-रज से गंगा पवित्र हो जाएगी, इसलिए पहले मैं आपके चरण धोऊँगा।
जौं परिहरि मोहि नाथ सिधाए।
को अब मोहि होइ सहाए॥
हा रघुनंदन प्राण पिआरे।
तुम बिनु जिअत बहुत दिन बारे॥
अर्थ : हे नाथ! यदि आप मुझे छोड़कर चले गए तो अब मेरा सहायक कौन होगा? हे रघुनंदन, हे प्राण-प्रिय! आपके बिना मैं बहुत दिन जीता रहा — यह मेरे लिए कष्टकर है।
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
अर्थ : राम-राज्य में दैहिक (शारीरिक), दैविक (प्राकृतिक) और भौतिक (सांसारिक) — किसी भी प्रकार का ताप (कष्ट) किसी को नहीं सताता। यह आदर्श राज्य का सर्वोच्च स्वप्न है।
भरत भूमि मन मधुकर होई।
सुमिरत राम चरन मन सोई॥
जाइ चलत नर करत सुभाऊ।
तिन्ह कर सुयश सुनहु रघुराऊ॥
अर्थ : भरत जी की भूमि पर जो भी जाता है, उसका मन भ्रमर की तरह राम-चरण-कमल में लग जाता है। हे रघुराज! उन भक्तों का यश सुनिए।
मुख्य पात्र
अयोध्याकाण्ड का संदेश
अयोध्याकाण्ड हमें सिखाता है कि सत्य और वचन का पालन सर्वोच्च धर्म है। भगवान राम ने राज्य का मोह त्यागकर केवल पिता के वचन की रक्षा के लिए वन स्वीकार किया — यही मर्यादा पुरुषोत्तम का अर्थ है।
भरत का त्याग यह दर्शाता है कि सच्चा भाई वह होता है जो भाई की अनुपस्थिति में भी उसके आदर्शों की रक्षा करे। भरत ने राज-सिंहासन पर राम की खड़ाऊँ रखकर मानव-इतिहास में त्याग का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया।
केवट और निषादराज का प्रसंग यह सिखाता है कि ईश्वर की भक्ति में जाति, वर्ण या ओहदे का कोई स्थान नहीं। एक साधारण नाविक की निःस्वार्थ भक्ति भी ईश्वर को उतनी ही प्रिय है।
रामचंद्र के भक्त सो रामहिं नित सुमिरेइ।
दैहिक दैविक भौतिक तापा जाइ, दुख न घेरेइ॥
अर्थ : जो प्रतिदिन रामचंद्र जी का स्मरण करता है, उसे शारीरिक, दैविक और भौतिक — किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं घेरता। राम-भक्ति ही जीवन की सबसे बड़ी ढाल है।