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सुन्दरकाण्ड — पंचम काण्ड

सुन्दरकाण्ड — दोहे

सम्पूर्ण ६० दोहे हिंदी अर्थ सहित

६०कुल दोहे
सर्ग

📝 सुन्दरकाण्ड — सम्पूर्ण दोहे

गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस के पंचम काण्ड — सुन्दरकाण्ड के सम्पूर्ण ६० दोहे, हिंदी अर्थ एवं व्याख्या सहित।

1जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय हरषाए॥ तब लगि मोहि परिखेहु तुम भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥
अर्थ: जांबवान के सुहावने वचन सुनकर हनुमान जी का हृदय हर्षित हो गया। (हनुमान जी बोले—) हे भाई! तब तक तुम मुझे राह देखना, दुःख सहते हुए कन्द, मूल और फल खाते हुए।
2जब लगि आवउँ सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥ यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥
अर्थ: जब तक सीता जी को देखकर न आऊं। यह काम होगा, मुझे विशेष हर्ष है। यह कहकर सभी को मस्तक नवाकर, हृदय में रघुनाथ जी को धारण करके हनुमान जी हर्षित होकर चले।
3सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥ बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥
अर्थ: समुद्र के किनारे एक सुन्दर पर्वत था। हनुमान जी कौतुक से उछलकर उसके ऊपर चढ़ गए। बार-बार रघुवीर का स्मरण करके, भारी बल धारण कर हनुमान जी (उस पर्वत से) उछले।
4जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी॥ हनूमान तेहि परसा कर पुनि। कीन्ह प्रनाम तुरत दुइ घुनी॥
अर्थ: समुद्र ने (मैनाक पर्वत से कहा—) हे मैनाक! रघुपति के दूत का विचार करके, तू इनकी थकान दूर कर। हनुमान जी ने उस (मैनाक) को हाथ से स्पर्श किया और तुरंत दोनों घुटने टेककर प्रणाम किया।
5जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥ सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥
अर्थ: पवनपुत्र को जाते देवताओं ने देखा। वे (उनका) बल और विशेष बुद्धि परखना चाहते थे। अहियों की माता सुरसा नाम की (एक राक्षसी) को भेजा, वह आकर (हनुमान जी से) बोली।
6आयेसु मोर सुनु हनुमंता। पैठेहु जो सीतहि देखंता॥ हौं तोहि खाबेउँ खाइ सो जाइ। मोरेहु बचन मृषा नहिं होई॥
अर्थ: (सुरसा ने कहा—) हे हनुमान! मेरी आज्ञा सुनो। सीता जी को देखने के लिए जो घुसा है, मैं उसे खाऊंगी — खाकर ही जाऊंगी। मेरा वचन मिथ्या नहीं होगा।
7जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥ सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥
अर्थ: उसने एक योजन मुंह फैलाया, हनुमान जी ने शरीर दुगुना किया। उसने सोलह योजन का मुंह बना लिया, तुरंत पवनसुत बत्तीस (योजन) हो गए।
8जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥ सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥
अर्थ: जैसे-जैसे सुरसा मुंह बढ़ाती, हनुमान जी दुगुना रूप दिखाते। उसने सौ योजन का मुंह बना लिया। पवनसुत ने अत्यंत छोटा रूप धारण किया।
9बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥ मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥
अर्थ: (हनुमान जी) मुंह में घुसे और फिर बाहर आ गए। उसे सिर नवाकर विदा माँगा। (सुरसा बोली—) देवताओं ने मुझे जिस काम के लिए भेजा था — तेरी बुद्धि और बल का भेद मैंने पा लिया।
10राम काजु सबु करिहउ तुम्ह। गए जाहु मन करहु न भ्रमहु॥ आसिष देइ गई सुरसा। जय हनुमान कृपा तुम्ह भ्रमहु॥
अर्थ: तुम राम का सारा काम करोगे, जाओ — मन में भ्रम मत करो। सुरसा ने आशीर्वाद देकर (विदा ली)। जय हो हनुमान — आप पर कृपा है।
11निसिचरि एक सिंधु महँ रहई। करि माया नभु के खग गहई॥ जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥ गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥
अर्थ: समुद्र में एक राक्षसी रहती थी। वह माया से आकाश के पक्षियों को पकड़ती थी। जो जीव-जंतु आकाश में उड़ते, जल में उनकी परछाईं देखकर उसे पकड़ लेती — उड़ नहीं सकते। इस प्रकार वह सदा গগনविहारियों को खाती थी।
12सो छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपाट सुत बध कीन्हा॥ तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥
अर्थ: उसने हनुमान जी के साथ वह छल किया। हनुमान जी ने उसके पुत्र का वध किया। (वह बोली—) हे तात! मेरे बहुत पुण्य हैं जो मैंने राम के दूत को नेत्रों से देखा।
13राम काजु करिबे कहुँ आतुर। उड़त महाधुनि गर्जत ढोल निरुत्तर॥ लंका दीख जब कपि मन माही। छाया ग्रह अस दसकंध राही॥
अर्थ: राम का काम करने के लिए उत्सुक हनुमान जी महाध्वनि करते, ढोल बजाते उड़े। जब हनुमान जी ने अपने मन में लंका देखी — जैसे राहु से ग्रस्त दसमुख (रावण) हो।
14रात्रि भयउ चिंतित मन माही। इहाँ तहाँ राम दूत बिराही॥ सोचइ मन तुरंत खल खाऊँ। देखउँ जाइ महावीर ठाऊँ॥
अर्थ: रात्रि हो गई। मन में चिंतित हनुमान जी इधर-उधर राम दूत को ढूंढते। (राक्षस) मन में सोचे — तुरंत दुष्ट को खाऊं और महावीर का स्थान जाकर देखूं।
15देखी सिया सुंदर भगिनी। बैठेहिं बीति जात निसि जामिनी॥ कस न सुनहु संकट हरना। देइ सब बात मुंह जुड़ाना॥
अर्थ: हनुमान जी ने सुन्दर भगिनी (माता सीता) को देखा। रात के पहर बीतते जा रहे थे। हे संकट हरने वाले! सब बातें बताइए, मुंह जुड़ाइए।
16तब हनुमंत कही सब राम कथा सुनाई। सुनत जानकी बहु सुख पाई॥ तब रघुपति गुन गाए हनुमाना। सुनि जानकी परम सुखु पाना॥
अर्थ: तब हनुमान जी ने सारी राम-कथा सुनाई। सुनकर जानकी जी को बहुत सुख मिला। तब हनुमान जी ने रघुपति के गुण गाए। सुनकर जानकी जी को परम सुख हुआ।
17बिहसि राम तब दीन्ही अँगूठी। जानु जानकी राम की जूठी॥ देखि मुदित भई जानकी। जानि प्रीति प्रभु की अनकी॥
अर्थ: तब राम जी ने हँसकर अँगूठी दी (और कहा—) जानकी को यह राम की निशानी जाना। देखकर जानकी जी प्रसन्न हुईं — प्रभु की प्रेम-प्रीति जानकर।
18कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥ केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपु हित मंत्र कहत जानकी॥
अर्थ: हनुमान जी ने कहा — हे प्रभु! वही विपत्ति है जब आपका स्मरण-भजन न हो। राक्षसों की बात क्या, जानकी जी शत्रु के हित की बात कहती हैं।
19नाथ हृदयँ गुनि देखहु मोरे। सीतापति सेवक सब ओरे॥ कपि भोजन दीन्ह सिय अनुसारी। प्रेम पुलकि तनु ह्वै उजियारी॥
अर्थ: हे नाथ! मेरे हृदय को गुनकर देखो — सीतापति के सेवक सब ओर हैं। सीता जी के निर्देशन से हनुमान जी को फल-भोजन दिया, प्रेम से पुलकित शरीर उज्ज्वल हो गया।
20सुनु कपि जियँ जानहि मोहि। चाहत राम मिलन मनि सोही॥ कहेउ राम बियोग तुम्ह जाना। करहु अब बेगि दूत कल्याना॥
अर्थ: (सीता जी बोलीं—) हे कपि! मन में मुझे जानो। वह मणि चाहती है जो राम से मिलाए। (हनुमान जी ने कहा—) राम जी के वियोग को आपने जाना। अब शीघ्र कल्याण दूत का काम करो।
21त्रिजटा सखि जानु सीता मन। राखहु छाहँ बचाइ जतन॥ केहि बिधि आइहि अकुल राजा। करिहि समर सागर उड़ाजा॥
अर्थ: त्रिजटा सखि ने जाना — सीता के मन को। छाया में बचाकर रखो। किस प्रकार व्याकुल राजा आएगा — समुद्र पार करके युद्ध करेगा।
22सुनि सीता अति अकुलाई। त्राहि त्राहि हे रघुराई॥ हनुमान देखी विपत बड़ी। ज्यों पनगन एकटक बाड़ी॥
अर्थ: यह सुनकर सीता जी अत्यंत व्याकुल हुईं — हे रघुराय! त्राहि-त्राहि! हनुमान जी ने बड़ी विपत्ति देखी — जैसे सर्पों के झुंड के बीच एकटक खड़ी हों।
23रावन हृदयँ बसहि ते जोई। जे हनुमान चाहत मति सोई॥ तब हनुमान कीन्ह उजियारा। जरत बिटप अति घन धन भारा॥
अर्थ: जो रावण के हृदय में बसे हैं — हनुमान जी वही बुद्धि चाहते हैं। तब हनुमान जी ने उजाला किया — जलते हुए वृक्ष अत्यंत घने और भारी थे।
24उहाँ दसानन सुनी निसिचर बानी। बोलहुँ कस सो कपि छुद्र खेलानी॥ कहत ताड़का सुत निकेत गहि। मम अपजस जग भरि भव रहि॥
अर्थ: वहाँ दशानन ने राक्षसों की बात सुनी — उस छोटे कपि की खिलवाड़ की बात क्यों करते हो? ताड़का के पुत्र का निवास पकड़कर कहा — मेरा अपयश जगत भर में फैल गया।
25कपि कें ममता रोम रोम में। सीता राम भरोसे चाहन गोम में॥ हनुमान अस हियँ अनुमाना। मरन ते ना डरत कपि जाना॥
अर्थ: हनुमान जी के रोम-रोम में ममता है। सीता-राम के भरोसे के साथ (चलते हैं)। हनुमान जी ने हृदय में यह अनुमान किया — कपि को मृत्यु से डर नहीं लगता।
26इहाँ पवनसुत करि सोइ लीला। चले बाँधे कौतुकी नीला॥ कपिहि ब्याल मनि होइ दीना। उरग नाग नाथि कपि कीना॥
अर्थ: यहाँ पवनसुत ने वह लीला की — नीले रंग के (राक्षस) बांधकर चले। सर्पराज की मणि से कपि दयनीय हुए। नागों को नाथकर कपि ने (जीत) किया।
27जरा जरेउ जब सिर पर पाऊँ। दसकंधर मम पुछि जब जाऊँ॥ देखि भालु कपिसेन भारी। हरषि गए प्रभु जय जयकारी॥
अर्थ: जब पैरों पर आग लगी तब (हनुमान बोले—) दसकंधर! मेरी पूंछ की बात पूछकर जाऊं। विशाल भालू-वानर सेना देखकर आनंदित होकर प्रभु जी जयकारी गए।
28तहँ धाए बहु मरकट बीरा। अंगद नील नल बड़ बल धीरा॥ हनुमान जाइ राम पद सीसा। निज प्रभु देखि भयउ अति थीसा॥
अर्थ: वहाँ बहुत से वानर वीर दौड़े — अंगद, नील, नल बड़े बल-धैर्यवान। हनुमान जी राम के चरणों में जाकर सिर नवाया। अपने प्रभु को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए।
29प्रीति सहित अनुज कहि बाता। कहत हनूमान सुनहु रघुनाथा॥ जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥
अर्थ: प्रेम सहित छोटे भाई को बताते हुए कहा — हे रघुनाथ! सुनिए। जनक की पुत्री, जगत की माता जानकी, करुणानिधान को अत्यंत प्रिय हैं।
30तासु दूत मैं नाथ पठाना। कपि सो जाइ करहु पहिचाना॥ हनुमत तुरत संजीवनी लाई। जामवंत सनमुख बैठाई॥
अर्थ: उनका दूत हे नाथ! मैं भेजा गया। उस कपि को जाकर पहचानो। हनुमान जी तुरंत संजीवनी लेकर आए और जांबवान के सामने बैठे।
31कहत राम सुनहु हनुमाना। जानेहु सीतहिं कहुँ बखाना॥ सुनि भाई दुखित बड़ होई। लंका जाइ सत्य कहु सोई॥
अर्थ: राम ने कहा — हे हनुमान! सुनो। सीता जी को कहाँ देखा — बताओ। भाई, सुनकर बहुत दुखी हुआ। लंका जाकर वह सत्य बताओ।
32नभ पंथ नाथ कटक चला। सागर सूखाइ नल सेतु बला॥ खल बन पावक ग्यान घन। रघुवीर तुलसी धर्म खन॥
अर्थ: नभमार्ग से नाथ की सेना चली। नल ने सेतु बांधकर सागर सुखाया। दुष्टों के लिए वन को जलाने वाले अग्नि और ज्ञान के मेघ — रघुवीर, तुलसी के धर्म की खान।
33नाथ परंतु सुनहु मन मांही। नहिं पावक बिन जल बिलगाही॥ सुग्रीव अंगद हनुमंत। कपि दल मिलि चलत तुरंत॥
अर्थ: हे नाथ! परंतु मन में सुनो — बिना अग्नि के जल अलग नहीं होता। सुग्रीव, अंगद, हनुमान — वानर दल मिलकर तुरंत चलते हैं।
34एहि बिधि जाइ कृपानिधाना। उतरे सागर तीर सुजाना॥ चरन कमल रज कहुँ सिर धारी। मुनि मन ध्यान सुखद सुखकारी॥
अर्थ: इस प्रकार कृपानिधान जाकर समुद्र के तीर पर उतरे। चरण-कमल की रज को सिर पर धारण करके — मुनियों के मन में ध्यान करने योग्य सुखदायी।
35जल अनल अनिल ब्योम खग जीव। राम भजि तरि जाहु सदीव॥ भव सागर पार परम गतिहीना। सुमिरेउँ राम कृपा प्रवीना॥
अर्थ: जल, अग्नि, वायु, आकाश, पक्षी, जीव — राम भजन करके सदा पार हो जाते हैं। भव सागर पार परम गति-हीन — मैंने राम का स्मरण किया, कृपा में प्रवीण।
36पुनि प्रभु कपिन्ह बुलाइ। कहि सब राखेहु उर लाइ॥ चले कपिन्ह तब सुनि रघुबीरा। भाले मारुत तनय अति धीरा॥
अर्थ: फिर प्रभु ने वानरों को बुलाया — सब कहकर हृदय से लगाया। रघुवीर की बात सुनकर वानर चले। मारुत के पुत्र अत्यंत धीर भाले लिए।
37सुरसरि जल लइ तरी सेना। नाथ सुमिरि उतरे करुणा घेना॥ सो छाँह हनुमंत महिमा नाँव। कहउँ न सकउँ बरनत गाव॥
अर्थ: सुर-सरिता (गंगा) का जल लेकर सेना पार हुई। नाथ का स्मरण करके करुणामय उतरे। हनुमान जी की महिमा की छाया का नाम — बताने में मैं गाते हुए नहीं कह सकता।
38तीनों काल जासु गुन गावहीं। निगम अगम अनुपम पावहीं॥ सो सेवक जासु मन बसहिं। त्रिभुवन में रावरे न रसहिं॥
अर्थ: तीनों काल जिनके गुण गाते हैं — वेद, अगम, अनुपम पाते हैं। वह सेवक जिसके मन में बसते हैं — तीनों लोकों में रावण जैसों को नहीं रुचते।
39कह जामवंत सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥ तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार प्रभु देखि अचावा॥
अर्थ: जांबवान ने कहा — हे हनुमान! सुनो, हे बलवान क्यों चुप साधे बैठे हो? तुम तो काल को भी ललकार लगाते हो — बार-बार प्रभु ने देखकर प्रसन्नता पाई।
40बिनु पग चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥ आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥
अर्थ: बिना पैर के चलते हैं, बिना कान के सुनते हैं। बिना हाथ के अनेक प्रकार के कार्य करते हैं। बिना मुंह के सब रसों का भोग करते हैं — बिना वाणी के बोलने वाले बड़े योगी।
41तन पुलकित बोलि हनुमंता। जो कछु कहत सुनहु भगवंता॥ मनहुँ बिरहानल जरत सरीरू। राम बिरह ब्याकुल रघुबीरू॥
अर्थ: शरीर पुलकित करके हनुमान जी बोले — हे भगवान! जो कुछ कहता हूं, सुनिए। मानो विरह की अग्नि में शरीर जल रहा हो — राम के विरह में रघुवीर व्याकुल।
42दुहुँ दिसि जय जय जय उच्चारा। सो दिन सुमंगल सबके सारा॥ सुर नर मुनि सब देत बधाई। मुदित मन सब देत बधाई॥
अर्थ: दोनों ओर से जय-जय-जय की उद्घोषणा। वह दिन सबके लिए सुमंगल का सार था। देव, मनुष्य, मुनि सभी बधाई दे रहे थे — प्रसन्न मन से सभी बधाई दे रहे थे।
43प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदय राखि कोसलपुर राजा॥ गरल सुधा रिपु करहिं मीता। गोपद सिंधु अनल सित सीता॥
अर्थ: नगर में प्रवेश करके सारे काम करो, हृदय में कोसल नरेश को रखकर। विष को अमृत, शत्रु को मित्र, समुद्र को गाय के पैर के बराबर — अग्नि को शीतल करो।
44तुलसिदास सदा हरि चेरा। कीजे नाथ हृदय महँ डेरा॥ ब्यापक ब्रह्म अखंड अनंता। अखिल अमोघ अजित श्रीकंता॥
अर्थ: तुलसीदास सदा हरि का सेवक है। हे नाथ! हृदय में डेरा डालो। व्यापक, अखंड, अनंत ब्रह्म — अखिल, अमोघ, अजित, श्रीकांत।
45राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार। तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजियार॥
अर्थ: हे तुलसी! यदि भीतर-बाहर उजाला चाहते हो तो जीभ रूपी दहलीज पर राम-नाम की मणि-दीप रखो।
46मासपारायण, बीसवाँ विश्राम संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥ जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
अर्थ: मासपारायण का बीसवाँ विश्राम। सभी संकट कटते हैं, सभी पीड़ाएं मिटती हैं — जो बलवीर हनुमान जी का स्मरण करता है। जय जय जय हनुमान गोसाईं — गुरुदेव की भाँति कृपा करो।
47नाम राम को अंक है सब साधन हैं सून। अंक गए कछु हाथ नहिं अंक रहे दस गून॥
अर्थ: राम-नाम ही अंक है, बाकी सब साधन शून्य हैं। अंक (राम नाम) के बिना कुछ हाथ नहीं, अंक के साथ दस गुना हो जाता है।
48एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान बिदिता॥ मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥
अर्थ: इसमें रघुपति का नाम उदार है — अत्यंत पावन, पुराणों में विदित। मंगल का घर, अमंगल को हरने वाले — दशरथ के आँगन में विहार करने वाले द्रवित हों।
49राम चरन रति होइ जब बल बिरति बिबेक। तब रघुनाथ कृपाल प्रभु देत मुक्ति अनेक॥
अर्थ: जब राम के चरणों में प्रेम हो, बल, वैराग्य और विवेक हो — तब कृपालु रघुनाथ प्रभु अनेक प्रकार की मुक्ति देते हैं।
50भव सिंधु अपार पार करन कहँ। राम नाम नौका तरन तहँ॥ तुलसी बिहंग बयान न करइ। राम नाम धन धरि उर हरइ॥
अर्थ: अपार भव-सागर पार करने के लिए — राम-नाम नौका है, उसमें तरो। तुलसी पक्षी बयान नहीं करता — राम-नाम धन को हृदय में रखकर (संकट) हरता है।
51दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी॥ मम हित लागि जन्म शिव धरेहू। निज मुख राम जसु नित बरेहू॥
अर्थ: हे दीनदयाल! अपनी बिरादरी याद करके, हे नाथ! मेरे भारी संकट हरो। मेरे हित के लिए शिव जी ने अवतार धारण किया — अपने मुख से नित्य राम का यश बोलते हैं।
52अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥ जासु ह्रदयँ भगति जसि होई। तासु प्रबल कहि जात न कोई॥
अर्थ: हे कृपालु! अब अपनी पवित्र भक्ति दो — कृपा करके अनपायनी (जो कभी न छूटे)। जिसके हृदय में जैसी भक्ति होती है — वह कितनी प्रबल है, कोई कह नहीं सकता।
53जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कवि उर अजर नचावहिं बानी॥ मोर सुधारिहि सो सब भाँति। जासु कृपा नहिं कृपा अघाती॥
अर्थ: जिस पर जानकर जन पर कृपा करते हैं — कवि के हृदय में अजर वाणी नचाते हैं। वह मेरा सब प्रकार से सुधार करेगा — जिनकी कृपा अतृप्त (कभी पूरी न होने वाली) है।
54प्रनवउ पवनकुमार खल बन पावक ज्ञान घन। जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥
अर्थ: पवनकुमार को प्रणाम करता हूं — दुष्टों के वन को जलाने वाली अग्नि और ज्ञान के मेघ। जिनके हृदय में धनुष-बाण सहित श्री राम निवास करते हैं।
55पुनि सनमुख हनुमान कहि। नाथ मोहि कछु देहु बताइ॥ चाहिए मोहि उत्तर दाखिना। अथवा कोउ पथ जाइ पाखिना॥
अर्थ: फिर हनुमान जी ने सामने होकर कहा — हे नाथ! मुझे कुछ बताइए। मुझे उत्तर या दक्षिण — अथवा कोई रास्ता पश्चिम से जाना चाहिए।
56नाथ नाम तव जपत मोही। सोइ बड़ि सेवा जानहु तोही॥ एकु संसय मोर नाथ। करहु छेदन राखि मम साथ॥
अर्थ: हे नाथ! आपका नाम जपते हुए मुझे — वही बड़ी सेवा जानो। हे नाथ! मेरा एक संशय है — मेरे साथ रखकर उसे दूर करो।
57जानत प्रिय मोहि रहत नाहीं। सो न निकट सेवा उर माहीं॥ कामिहि नारि पियारि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम॥ तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥
अर्थ: प्रिय जानते हुए भी पास नहीं रहना — वह निकट-सेवा मन में नहीं। जैसे कामी को नारी प्यारी होती है, लोभी को जैसे धन प्रिय होता है — वैसे ही हे रघुनाथ! राम मुझे निरंतर प्रिय लगें।
58सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत। मैं सेवक सचराचर रूप स्वामी भगवंत॥
अर्थ: हे हनुमान! वह अनन्य है जिसकी यह बुद्धि नहीं टलती — मैं सेवक हूं और चर-अचर के रूप में भगवान स्वामी हैं।
59मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर। अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर॥
अर्थ: मेरे समान दीन नहीं और दीनहित तुम्हारे समान — हे रघुवीर! ऐसा विचारकर, रघुवंश के मणि, भयंकर भव-भय हरो।
60राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥ जय हनुमान ज्ञान गुण सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
अर्थ: राम के काम के लिए तुम्हारा अवतार हुआ — सुनते ही पर्वत के आकार के हो गए। जय हनुमान — ज्ञान और गुण के सागर! जय कपीश — तीनों लोकों को उजागर करने वाले!

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