किष्किन्धाकाण्ड — परिचय
श्री रामचरितमानस का चतुर्थ काण्ड "किष्किन्धाकाण्ड" वानरराज सुग्रीव से भगवान राम की मित्रता और हनुमान जी के अवतरण का काण्ड है। यह काण्ड बालि वध, सुग्रीव का राज्याभिषेक और सीता की खोज के लिए वानर-सेना के प्रस्थान की कथा कहता है।
इस काण्ड में हनुमान जी पहली बार राम से मिलते हैं — यह मिलन भक्ति और भगवान के बीच की अलौकिक घटना है। किष्किन्धाकाण्ड सात काण्डों में आकार में छोटा है परन्तु भक्ति, मित्रता और न्याय के संदेश में अत्यंत गहरा है।
सुनि सुभ बचन हरष हनुमाना।
हृदय हरष प्रभु चरन नाना॥
तब रघुपति हनुमंत बुलाई।
लिए हृदय लाई रघुराई॥
अर्थ : शुभ वचन सुनकर हनुमान हर्षित हुए और प्रभु के चरणों में वंदना की। तब रघुपति ने हनुमान को बुलाया और रघुराज ने उन्हें हृदय से लगा लिया।
किष्किन्धाकाण्ड में राम का न्याय-प्रेम दिखता है — बाली ने सुग्रीव पर अत्याचार किया था, इसलिए राम ने बाली का वध किया। यह काण्ड यह भी सिखाता है कि ईश्वर हमेशा पीड़ितों की रक्षा करते हैं।
कथा संक्षेप
ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव ने हनुमान को राम के पास भेजा। हनुमान ब्राह्मण वेश में गए। राम ने हनुमान के वेद-पंडित वचन सुनकर लक्ष्मण से कहा — "जिसका सेवक ऐसा हो, उस सुग्रीव से अवश्य मिलना चाहिए।"
हनुमान ने राम और सुग्रीव को कंधे पर बैठाकर ऋष्यमूक पर्वत पर लाए। अग्नि को साक्षी मानकर दोनों ने मित्रता की। सुग्रीव ने सीता के आभूषण दिखाए जो उन्होंने गिरते हुए देखे थे।
राम की सहायता से सुग्रीव ने बाली को युद्ध के लिए ललकारा। राम ने पेड़ की ओट से बाण मारकर बाली का वध किया। बाली ने मरते समय राम से प्रश्न किया — "आपने छिपकर क्यों मारा?" राम ने धर्म-युक्त उत्तर दिया।
बाली के वध के बाद सुग्रीव को किष्किन्धा का राजा बनाया गया। अंगद को युवराज पद दिया गया। बाली की पत्नी तारा ने विलाप किया। राम ने उन्हें ज्ञान का उपदेश देकर शांत किया।
वर्षा ऋतु आने पर राम और लक्ष्मण प्रवर्षण पर्वत पर रहे। राम ने सीता के विरह में वर्षा-वर्णन और विरह-वर्णन किया। यह प्रसंग काव्य-सौंदर्य की दृष्टि से अत्यंत मनोरम है।
वर्षा के बाद सुग्रीव भोग-विलास में डूब गए और सीता खोज का वादा भूल गए। लक्ष्मण क्रोधित होकर किष्किन्धा गए। हनुमान ने मध्यस्थता की और सुग्रीव को सचेत किया।
सुग्रीव ने चारों दिशाओं में वानर-दल भेजे। दक्षिण दिशा के लिए हनुमान, अंगद, जांबवान और अन्य वीर वानरों की सेना भेजी गई। राम ने हनुमान को अपनी अँगूठी दी जिससे सीता पहचान सकें।
वानर सेना समुद्र तट पर पहुँची। वहाँ जटायु के बड़े भाई संपाती मिले। उन्होंने बताया कि सीता माता लंका में अशोक वाटिका में हैं। अब समस्या थी — सौ योजन समुद्र कौन पार करेगा?
मुख्य चौपाइयाँ और दोहे
जामवंत के बचन सुहाए।
सुनि हनुमंत हृदय हरषाए॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम भाई।
सहि दुख कंद मूल फल खाई॥
अर्थ : जामवंत के मधुर वचन सुनकर हनुमान का हृदय हर्षित हो गया। हनुमान ने कहा — "हे भाइयो! तब तक मेरी प्रतीक्षा करो, कंद-मूल-फल खाकर दुख सहो।"
जे न मित्र दुख होंहि दुखारी।
तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥
निज दुख गिरि सम रज करि जाना।
मित्रक दुख रज मेरु समाना॥
अर्थ : जो मित्र के दुख में दुखी नहीं होते, उन्हें देखने मात्र से पाप लगता है। अपने दुख को पर्वत के समान और मित्र के दुख को सुमेरु पर्वत के समान मानना चाहिए।
धर्म अधर्म जानत सब कोई।
जो आचरइ सो धर्मिष्ट होई॥
राम मारी बाली सब जाना।
जे हठि करहिं तिन्ह धर्म पुराना॥
अर्थ : धर्म और अधर्म सभी जानते हैं, परन्तु जो उसे आचरण में लाता है वही धर्मिष्ट है। राम ने बाली को मारकर यही सिद्ध किया।
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना।
का चुप साधि रहे बलवाना॥
पवन तनय बल पवन समाना।
बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥
अर्थ : जाम्बवान ने कहा — हे हनुमान! हे बलवान! क्यों चुप बैठे हो? तुम पवन के पुत्र हो, तुम्हारा बल वायु के समान है। तुम बुद्धि, विवेक और विज्ञान के भंडार हो।
मुख्य पात्र
किष्किन्धाकाण्ड का संदेश
किष्किन्धाकाण्ड हमें सिखाता है कि सच्ची मित्रता वह है जो संकट में काम आए। राम और सुग्रीव की मित्रता आपसी आवश्यकता और विश्वास पर आधारित थी — यही मित्रता का सर्वोच्च रूप है।
बाली वध का प्रसंग यह सिखाता है कि अत्याचार चाहे कितना भी बलशाली क्यों न हो, अंत में न्याय की विजय होती है। बाली कितना भी शक्तिशाली था, परन्तु उसका अधर्म उसके विनाश का कारण बना।
जाम्बवान का हनुमान को याद दिलाना यह सिखाता है कि कभी-कभी हमें अपनी शक्ति का ज्ञान नहीं होता — एक सच्चा गुरु हमें हमारी सामर्थ्य याद दिलाता है।
सखा सोच त्यागहु बल नाहीं।
करहु सो जो तुम्हारे मन माहीं॥
अर्थ : हे मित्र! चिंता छोड़ो, अब कोई बल की कमी नहीं है। जो तुम्हारे मन में है वह करो। यह वाक्य जाम्बवान का हनुमान के प्रति था — और यह हम सबके लिए भी संदेश है।