लंकाकाण्ड — परिचय
श्री रामचरितमानस का षष्ठ काण्ड "लंकाकाण्ड" (जिसे युद्धकाण्ड भी कहते हैं) रामायण का सबसे रोमांचक और विशाल युद्ध-काण्ड है। इस काण्ड में समुद्र पर सेतु निर्माण से लेकर रावण वध, सीता माता की अग्नि-परीक्षा और राम के अयोध्या प्रत्यागमन तक की महाकाव्यात्मक कथा है।
इस काण्ड में विभीषण का राम-शरण में आना, नल-नील द्वारा सेतु निर्माण, मेघनाद-कुम्भकर्ण-रावण का वध और अंततः राम का राज्याभिषेक — ये सभी महत्त्वपूर्ण प्रसंग हैं। लंकाकाण्ड धर्म की अधर्म पर, सत्य की असत्य पर और भक्ति की अहंकार पर विजय का महाकाव्य है।
राम काज लगि तव अवतारा।
सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥
कनक भूधराकार सरीरा।
समर भयंकर अतिबल बीरा॥
अर्थ : राम के कार्य के लिए ही तुम्हारा अवतार हुआ है — यह सुनते ही हनुमान पर्वत के आकार के हो गए। सोने के पर्वत जैसा शरीर, युद्ध में भयंकर और अत्यंत बलशाली वीर।
लंकाकाण्ड में भगवान राम की रणनीति, उनकी करुणा (रावण को बार-बार अवसर देना) और अंत में न्याय का प्रतिष्ठापन — तीनों का अद्भुत समन्वय है। यह काण्ड वीर रस का सर्वोत्तम उदाहरण है।
कथा संक्षेप
राम ने तीन दिन समुद्र से रास्ता माँगा परन्तु समुद्र नहीं आया। क्रोधित राम ने अग्नि-बाण निकाला तब समुद्र प्रकट हुआ और नल-नील से सेतु बनाने का उपाय सुझाया।
नल-नील के नेतृत्व में वानर-सेना ने पत्थरों पर "राम" लिखकर समुद्र में डाला — पत्थर तैरने लगे। पाँच दिन में सौ योजन का पुल बन गया। सम्पूर्ण वानर-सेना लंका की ओर चली।
रावण के भाई विभीषण ने रावण को सीता वापस करने की सलाह दी — रावण ने अपमानित कर भगा दिया। विभीषण राम की शरण में आए। राम ने उन्हें लंका का राजा घोषित किया — "शरणागत की रक्षा करना हमारा धर्म है।"
वानर-सेना ने लंका पर आक्रमण किया। लंका के चारों द्वारों पर भीषण युद्ध। राक्षसों और वानरों में घमासान। हनुमान, अंगद, नल, नील और अन्य वीरों ने राक्षस-सेना को परास्त किया।
मेघनाद ने लक्ष्मण पर शक्ति-बाण चलाया — वे मूर्छित हो गए। हनुमान ने द्रोणाचल से संजीवनी बूटी लाकर सुषेण वैद्य को दी। लक्ष्मण पुनः जागृत हुए और मेघनाद का वध किया।
रावण ने कुम्भकर्ण को जगाया। कुम्भकर्ण ने रावण को समझाने की कोशिश की परन्तु नहीं माना। विशाल कुम्भकर्ण ने वानर-सेना पर हमला किया। भगवान राम ने उसका वध किया।
सभी पुत्रों और भाइयों के मारे जाने के बाद रावण स्वयं युद्ध में आया। राम-रावण का भीषण युद्ध हुआ। राम ने ब्रह्मास्त्र (विभीषण के बताए नाभि-रहस्य से) रावण की नाभि में मारकर उसका वध किया।
रावण के मृत्यु के बाद सीता माता राम के पास आईं। राम ने लोक-मर्यादा के लिए अग्नि-परीक्षा दी। अग्नि देव ने कहा — "सीता सर्वथा पवित्र हैं।" सीता माता निर्मल और तेजस्वी रूप में निकलीं।
विभीषण को लंका का राजा बनाया गया। पुष्पक विमान में राम, सीता और लक्ष्मण सहित समस्त वानर-दल अयोध्या के लिए रवाना हुए। रास्ते में सभी महत्त्वपूर्ण स्थानों के दर्शन हुए।
अयोध्या पहुँचने पर भरत ने राम का स्वागत किया। महर्षि वशिष्ठ ने राम का राज्याभिषेक किया। राम-राज्य की स्थापना हुई जहाँ कोई दुखी नहीं था। यही रामायण का परम लक्ष्य था।
मुख्य चौपाइयाँ और दोहे
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥
अर्थ : जो अपने अहित की आशंका से शरणागत को त्याग देते हैं — वे मनुष्य पतित और पापमय हैं। उन्हें देखना भी हानिकारक है। यह राम का शरणागत-वत्सल स्वभाव है।
कह रावन सुनु बिनय हमारी।
देहु सीता मम भवन सिधारी॥
जनि जड़ काटेसि अपनी साखा।
हमहि सीता दे बचहि तव नाखा॥
अर्थ : राम ने कहा — हे रावण! मेरी विनती सुन। सीता को दे दे और अपने घर वापस जा। नासमझी में अपनी ही शाखा मत काट। सीता लौटाने पर तू बच जाएगा। — यह राम की असीम करुणा है।
तब रघुपति रावन कर काटा।
भूमि परेउ नभ भई विराटा॥
ब्रह्मांड विदारी उठी भारी।
त्रास पाई देव सब भारी॥
अर्थ : तब रघुपति ने रावण का सिर काट डाला। वह भूमि पर गिरा और आकाश में विशाल शब्द हुआ। ब्रह्मांड विदीर्ण हो उठा और सभी देवता त्रस्त हो गए।
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
अर्थ : राम-राज्य में दैहिक, दैविक और भौतिक किसी प्रकार का ताप किसी को नहीं सताता। सभी मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेद-विहित मार्ग पर चलते हैं।
राम नाम मंत्र लिखि पाहन।
तरत उड़त नभ लाई लाहन॥
लिखि रघुपति नाम पाहन भारे।
बोरत ते तरि गए नारे॥
अर्थ : वानरों ने पत्थरों पर राम का नाम लिखकर समुद्र में डाला — और वे पत्थर तैर गए। भारे-से-भारे पत्थर राम-नाम से समुद्र पर तैरने लगे — यही राम-नाम की महिमा है।
मुख्य पात्र
लंकाकाण्ड का संदेश
लंकाकाण्ड का सर्वोच्च संदेश है — अधर्म का अंत अवश्य होता है। रावण त्रिलोक-विजेता था, अजेय था, परन्तु उसका अहंकार और पाप उसके विनाश का कारण बना। धर्म की विजय अटल है।
विभीषण का प्रसंग यह सिखाता है कि अपने कुल की गलत परंपराओं का साथ न देकर सत्य और धर्म का साथ देना ही वीरता है। परिवार और देश की गलत नीतियों का विरोध करने का साहस होना चाहिए।
राम-राज्य की स्थापना यह दर्शाती है कि जब शासन धर्म पर आधारित हो, न्याय सर्वोपरि हो और राजा प्रजा का पिता हो — तब ही आदर्श राज्य बनता है।
रामचंद्र की जय जय जय।
कहत सुर मुनि हरषित हृदय॥
जय सुग्रीव विभीषण भाई।
जय हनुमान प्रताप बड़ाई॥
अर्थ : "रामचंद्र की जय!" — यह कहते हुए देव और मुनि हर्षित हो उठे। सुग्रीव, विभीषण, और महाप्रतापी हनुमान की भी जय हो — यह विजय घोष सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में गूँजा।