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मानस स्तुति

विनय पत्रिका

गोस्वामी तुलसीदास की भगवान राम को विनय-पत्री — प्रमुख पद अर्थ सहित

📜 विनय पत्रिका — परिचय

विनय पत्रिका गोस्वामी तुलसीदास जी की एक अनूठी रचना है। यह भगवान राम को लिखी एक पत्री (letter) है जिसमें कवि ने अपने मन की व्यथा, पश्चाताप और भक्ति को कविता में पिरोया है। इसमें कुल २७९ पद हैं।

📜 विशेषता: विनय पत्रिका तुलसीदास जी का सर्वाधिक व्यक्तिगत और भावुक ग्रंथ है। वे स्वयं को पापी-अधम बताते हुए राम की शरण माँगते हैं।

📃 प्रमुख पद

📜 भगवान की महिमा
राम सो बड़ो है कौन? मोसो कौन छोटो?
राम से बड़ा कौन है? मुझसे छोटा कौन है? राम पतितपावन हैं — मैं पतित हूं। इस संसार में दोनों के मिलन से दोनों का काम होता है।
📜 एकनिष्ठ भक्ति
मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई। जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई॥
मेरे तो गिरिधर गोपाल हैं — दूसरा कोई नहीं। जिनके सिर पर मोर-मुकुट है — वही मेरे पति हैं।
📜 राम नाम महिमा
काहे को रोइयत राम नाम लइ। सुख-दुख दोनों एक समान भइ॥
राम नाम लेकर क्यों रोते हो? सुख और दुख दोनों एक समान हो गए।
📜 शरणागति
तुलसी सरनाम गुलाम है राम को। जाको रुचे सो कहे कछु काम को॥ मांगत तुलसीदास लाड करो। रघुनाथ सो मोहि छांड करो न॥
तुलसी राम का प्रसिद्ध गुलाम है — जिसे रुचे, राम के काम की बात करे। तुलसीदास माँगता है — लाड़ करो। रघुनाथ मुझे छोड़ो नहीं।
📜 जागरण
अब लौं नसानी, अब न नसैहौं। रामकृपा भव-निसा सिरानी, जागे फिर न डसैहौं॥
अब तक नष्ट होता रहा, अब नहीं नष्ट होऊंगा। राम की कृपा से भव-रात्रि समाप्त हुई — जागकर फिर सोऊंगा नहीं।
📜 विश्वास
भरोसो दृढ़ इन चरनन्ह केरो। श्री रघुनाथ कृपाल कृपानिधि, दास जानि कीजै नेरो॥
इन चरणों पर दृढ़ भरोसा है। हे श्री रघुनाथ, कृपालु, कृपानिधान! दास जानकर निकट कीजिए।
📜 मंगलाचरण
श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन। हरण भव भय दारुणम्॥
हे मन! कृपालु रामचंद्र का भजन कर — जो भव-भय के दारुण को हरते हैं।
📜 शरणागति की विनती
जौं पै दुर्गति नरक ही ठानी। तौ काहे को यह पहिचानी॥ प्रभु सो बड़ो न मोसो छोटो। मेल कियो तेहि ताकि ओटो॥
यदि दुर्गति और नरक ही ठाना है तो यह पहचान क्यों दी? प्रभु से बड़ा नहीं, मुझसे छोटा नहीं — उन्होंने मेल किया, उनकी आड़ में हूं।
📜 उपदेश
तुलसिदास अब का करहु। राम नाम जपि भव तरहु॥ संसार से मन हटाओ। राम सरन ले जाओ॥
हे तुलसीदास! अब क्या करते हो — राम नाम जपकर भव-सागर तरो। संसार से मन हटाओ और राम की शरण लेकर जाओ।

💡 विनय पत्रिका का संदेश

🙏

शरणागति

राम की शरण में जाना ही सबसे बड़ा ज्ञान है।

😔

विनम्रता

स्वयं को अधम मानकर कृपा मांगना — भक्ति का उच्चतम रूप।

❤️

प्रेम भक्ति

राम से प्रेम करना, उनसे बातें करना — यही पत्रिका सिखाती है।

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भव-पार

इस संसार-सागर से राम नाम नौका ही पार लगाती है।