सुन्दरकाण्ड — परिचय
श्री रामचरितमानस का पंचम काण्ड "सुन्दरकाण्ड" सम्पूर्ण रामायण का हृदय है। यह एकमात्र ऐसा काण्ड है जिसका नायक भगवान राम नहीं बल्कि उनके परम भक्त हनुमान जी हैं। इस काण्ड को "सुन्दर" इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें हनुमान की सुंदर भक्ति, सुंदरी सीता की खोज और सुन्दर लंका का वर्णन है।
डॉ. धवलकुमार व्यास जी के प्रवचन विशेष रूप से इसी काण्ड पर केंद्रित हैं। सुन्दरकाण्ड का पाठ विश्वास, साहस और भक्ति का पाठ है — यही कारण है कि घर-घर में इस काण्ड का पाठ होता है और यह मनोकामना पूर्ण करने वाला माना जाता है।
शांतं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदम्।
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्॥
अर्थ : जो शांत, शाश्वत, अप्रमेय, निष्पाप और निर्वाण-शांति देने वाले हैं, जिनकी ब्रह्मा, शिव और शेषनाग सेवा करते हैं, जो वेदांत से जाने जाते हैं — उन सर्वव्यापी राम की वंदना।
सुन्दरकाण्ड में हनुमान जी समुद्र पार कर लंका पहुँचते हैं, सीता माता से मिलते हैं, लंका दहन करते हैं और राम को सुसंवाद लाते हैं। यह काण्ड साहस, बुद्धि और भक्ति का अद्वितीय संगम है।
कथा संक्षेप
हनुमान जी ने विशाल रूप धारण कर एक ही छलाँग में सौ योजन का समुद्र पार किया। रास्ते में मैनाक पर्वत ने विश्राम का निमंत्रण दिया, सुरसा ने परीक्षा ली और सिंहिका का वध किया।
लंका में प्रवेश के लिए हनुमान ने अत्यंत लघु रूप धारण किया। रात्रि में नगर का भ्रमण किया। लंका-देवी ने रोका तो एक मुष्टिका प्रहार से उसे परास्त किया। लंका की सोने की पुरी देखकर आश्चर्यचकित हुए।
हनुमान ने रावण के महल में प्रवेश किया। सोते हुए रावण को देखा — उसकी भव्यता और वैभव देखकर चकित हुए। मंदोदरी को पहले सीता समझा, परन्तु उनके गुणों का विचार करने पर जाना कि यह सीता नहीं हैं।
अशोक वाटिका में सीता माता को खोजा। वे दुखी, कृशकाय और राम के वियोग में आँसू बहा रही थीं। रावण आया और विवाह की माँग की। सीता ने दृढ़ता से मना किया। राक्षसियाँ उन्हें डराती-धमकाती रहीं।
हनुमान ने पेड़ पर बैठे राम-कथा सुनाई। सीता माता को विश्वास दिलाने के लिए राम की दी हुई अँगूठी दी। सीता माता ने अँगूठी देखकर विश्वास किया। उन्होंने चूड़ामणि (शिरोमणि) हनुमान को दी।
सीता से मिलने के बाद हनुमान ने अशोक वाटिका के वृक्ष उखाड़े, फल खाए और राक्षसों को मारा। रावण ने अपने पुत्र अक्षय कुमार को भेजा — हनुमान ने उसका वध किया।
रावण के पुत्र मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र से हनुमान को बांधा। हनुमान को रावण की सभा में लाया गया। रावण ने वार्तालाप किया। हनुमान ने रावण को राम की शरण जाने का उपदेश दिया।
रावण ने हनुमान की पूंछ में आग लगाने का आदेश दिया। हनुमान ने पूंछ से पूरी लंका जला दी — सोने की लंका धू-धू कर जल उठी। सीता माता की प्रार्थना से हनुमान की पूंछ को आग नहीं लगी।
हनुमान समुद्र पार कर वापस आए। "जय श्री राम" के घोष से सबने स्वागत किया। राम के सामने सीता माता का संदेश और चूड़ामणि दी। राम ने हनुमान को हृदय से लगाया।
मुख्य चौपाइयाँ और दोहे
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि पुत्र पवन सुत नामा॥
अर्थ : हे हनुमान! तुम्हारी जय हो — तुम ज्ञान और गुण के सागर हो। हे वानरराज! तीनों लोकों को प्रकाशित करने वाले तुम्हारी जय हो। तुम राम के दूत, अतुलनीय बल के धाम, अंजनी के पुत्र और पवनपुत्र हो।
कह कपि हृदय धीर धरु माता।
सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई।
सुनि सुभ बचन हरषि मन जाई॥
अर्थ : हनुमान ने कहा — हे माता! हृदय में धैर्य धरो। सेवकों को सुख देने वाले राम का स्मरण करो। प्रभु राम की शक्ति को हृदय में लाओ — यह सुंदर वचन सुनकर सीता का मन हर्षित हो गया।
सुनहु देव सचराचर स्वामी।
प्रनतपाल उर अंतरयामी॥
उर करि बिनय बिनीत मैं कहऊँ।
राम दूत पहिचानि लेहऊँ॥
अर्थ : हे देव! हे चराचर के स्वामी! हे शरणागत के पालक और अन्तर्यामी! हे सीता माता! विनम्रतापूर्वक मैं कह रहा हूँ — मुझे राम का दूत जानकर पहचानो।
हरि प्रेरित तेहि अवसर चला।
ब्रह्मास्त्र तेज सहि सकइ न भाला॥
उठेउ बाँधि चला कपि तहाँ।
जहाँ रहे रघुपति कपि जहाँ॥
अर्थ : हरि की प्रेरणा से उस समय ब्रह्मास्त्र का तेज सहन नहीं हो सका। बंधे हुए हनुमान को वहाँ ले जाया गया जहाँ रघुपति के भक्त थे — यह लंका दहन का पूर्व-संदर्भ है।
प्रनाम करइ सो बार बार।
सियहि देखि भेंटि उर लाई।
हरषित होइ सियाँ हिय लाई।
जनु ते रामहि दरस दिखाई॥
अर्थ : हनुमान ने बार-बार प्रणाम किया। सीता जी ने हनुमान को देखकर ऐसे हृदय से लगाया जैसे वे स्वयं राम का दर्शन हो। यह माता का हनुमान के प्रति प्रेम दर्शाता है।
मुख्य पात्र
सुन्दरकाण्ड का संदेश
सुन्दरकाण्ड का मुख्य संदेश है — राम का नाम लेकर असंभव भी संभव हो जाता है। हनुमान जी ने सौ योजन का समुद्र, सोने की लंका और लाखों राक्षसों को केवल राम-नाम के बल पर परास्त किया।
सीता माता का धैर्य यह सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी अपने आदर्शों और ईश्वर-भरोसे को नहीं छोड़ना चाहिए। रावण के सारे प्रलोभनों के बावजूद सीता अटल रहीं।
लंका दहन यह दर्शाता है कि अहंकार और पाप की सोने की लंका भी एक दिन जलकर राख हो जाती है। भौतिक वैभव ईश्वर-भक्ति और धर्म से बड़ा नहीं होता।
सुंदर कांड पढ़े नित भाई।
सकल काज सिधि होइ सुभाई॥
मन क्रम बचन जो नित पढ़ई।
ताके काज सकल सिधि लई॥
अर्थ : जो प्रतिदिन सुन्दरकाण्ड का पाठ करता है, उसके सभी कार्य सिद्ध होते हैं। मन, कर्म और वचन से जो नित्य पाठ करे, उसके सभी कार्य सफल होते हैं — यही इस काण्ड की महिमा है।