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मानस स्तुति

श्री हनुमान अष्टक

आठ शक्तिशाली श्लोक — हनुमान जी की महिमा का वर्णन

श्लोक
अष्टकरचना

🙏 हनुमान अष्टक — परिचय

हनुमान अष्टक में हनुमान जी की आठ प्रकार की शक्तियों, गुणों और महिमाओं का वर्णन है। यह स्तोत्र विशेष रूप से संकट के समय पाठ करने पर शीघ्र फल देता है।

विशेष लाभ: हनुमान अष्टक का पाठ विशेष रूप से शत्रु-बाधा, भय, रोग और न्यायालय के मामलों में अत्यंत प्रभावशाली है।

📃 हनुमान अष्टक — ८ श्लोक

श्लोक 1
बाल समय रबि भक्ष लियो तब, तीनहुँ लोक भयो अँधियारो। ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो॥ देवन आनि करी बिनती तब, छाड़ि दियो रबि कष्ट निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
बाल अवस्था में आपने सूर्य को फल समझकर निगल लिया — तब तीनों लोकों में अंधकार छा गया। जगत को बड़ा त्रास हुआ — यह संकट किसी से दूर नहीं किया जा सका। तब देवताओं ने आकर विनती की और आपने सूर्य को छोड़कर कष्ट निवारण किया। हे कपि! जगत में कौन नहीं जानता — आपका नाम संकटमोचन है।
श्लोक 2
बालि की त्रास कपीस बसत थे, सुर सिंधु पार खेती करावत। सीया हरन गई जब माया, राम हनू तुमहि याद दिलावत॥ निसिचर हनत, शत्रु को दूरि किए, लड़त महाबल बाहु बचावत। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
बाली के त्रास से वानर राजा सुग्रीव समुद्र के पार रहकर खेती करते थे। जब रावण की माया से सीता हरण हुआ, राम ने तुम्हें याद किया। राक्षसों का वध करके शत्रुओं को दूर किया, महाबल से भुजाएं बचाईं। हे कपि! जगत में कौन नहीं जानता — आपका नाम संकटमोचन है।
श्लोक 3
अंगद के संग लेन गए सिय, खोज कपीस यह बैन उचारे। जीवत ना बचिहौ हम सो जु, बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारे॥ हेरि थके तट सिंधु सबे तब, लाय सिया सुधि प्रान उबारे। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
सीता की खोज में अंगद के साथ जाते समय वानरराज ने कहा — बिना सुधि लाए वापस आए तो जीवित नहीं बचोगे। सभी समुद्र तट पर थककर बैठे — तब सीता की सुधि लाकर आपने सबके प्राण बचाए। हे कपि! जगत में कौन नहीं जानता — आपका नाम संकटमोचन है।
श्लोक 4
बान लागि आतुर जिय से, रघुवर दीन्ह सुत बेदन मारे। मेघनाद की शक्ति लगी तब, संकट में पड़े रघुबीर दुलारे॥ आनि संजीवनि हाथ दई तब, लछिमन के प्रान उबारे। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
बाण लगने से रघुवर के पुत्र व्याकुल हुए। मेघनाद की शक्ति से रघुवीर के प्रिय संकट में पड़े। तब संजीवनी लाकर हाथ में देकर लक्ष्मण जी के प्राण बचाए। हे कपि! जगत में कौन नहीं जानता — आपका नाम संकटमोचन है।
श्लोक 5
बंधु समेत जबे अहिरावन, ले रघुनाथ पाताल सिधारे। देबिन्ह पूजि भली बिधि सों सब, माँगत मेवा अति हित नियारे॥ जाय सहाय भयो तब ही तुम, आय महा रन बाहु बिदारे। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
जब अहिरावण भाई-बंधु सहित रघुनाथ जी को पाताल में ले गया। देवियों की पूजा करके मेवा मांगी। तब आप सहाय बने और महायुद्ध में भुजाएं विदारकर आए। हे कपि! जगत में कौन नहीं जानता — आपका नाम संकटमोचन है।
श्लोक 6
काज किए बड़े देवन के तुम, वीर महाप्रभु देखि बिचारे। कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसे नहिं जात है टारे॥ बेगि हरो हनुमान महाप्रभु, जो कछु संकट होय हमारे। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
आपने देवताओं के बड़े-बड़े काम किए — हे महाप्रभु वीर! विचार करके देखिए। मेरे जैसे गरीब का कौन सा संकट है जो आपसे दूर नहीं किया जा सकता? हे महाप्रभु हनुमान! जो कुछ हमारा संकट हो — उसे शीघ्र हरो। हे कपि! जगत में कौन नहीं जानता — आपका नाम संकटमोचन है।
श्लोक 7
देत दरस हित नाम जपत मन, संकट टारत पल में तुम्हारो। भक्त विपत बिनसाय महा तुम, सरन पड़्यो जो गहे तुम्हारो॥ जो मन नाथ तिहारे जपत हैं, सुख सम्पति भव सिंधु उतारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
आपका नाम जपने से दर्शन मिलते हैं और संकट पल में दूर होता है। भक्तों की विपत्ति का नाश करते हैं — जो आपकी शरण में आता है। जो मन से आपका नाम जपते हैं — उन्हें सुख-संपत्ति देकर भवसागर से उतारते हैं। हे कपि! जगत में कौन नहीं जानता — आपका नाम संकटमोचन है।
श्लोक 8
लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लंगूर। वज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर॥
लाल देह पर लालिमा छाई है, लाल पूंछ धारण किए हैं। वज्र के समान देह से दानवों का दलन करने वाले — जय जय जय हे कपि वीर!