📃 सर्ग १ — जांबवान-हनुमान संवाद एवं समुद्र लंघन
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय हरषाए॥
जांबवान के सुहावने वचन सुनकर हनुमान जी का हृदय हर्षित हो गया।
तब लगि मोहि परिखेहु तुम भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥
हनुमान जी ने कहा — हे भाई! तब तक मुझे राह देखना, दुःख सहते हुए कन्द, मूल और फल खाते रहना।
जब लगि आवउँ सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
जब तक सीता जी को देखकर न आऊं। काम होगा, मुझे विशेष हर्ष है।
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥
यह कहकर सभी को मस्तक नवाकर, हृदय में रघुनाथ को धारण करके हनुमान जी हर्षित होकर चले।
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
समुद्र के किनारे एक सुन्दर पर्वत था। हनुमान जी कौतुक से उछलकर उसके ऊपर चढ़ गए।
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥
बार-बार रघुवीर का स्मरण करके, भारी बल धारण करके हनुमान जी उस पर्वत से उछले।
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी॥
समुद्र ने कहा — हे मैनाक! रघुपति के दूत का विचार करके इनकी थकान दूर करो।
हनूमान तेहि परसा कर पुनि। कीन्ह प्रनाम तुरत दुइ घुनी॥
हनुमान जी ने उस (मैनाक) को हाथ से स्पर्श किया और तुरंत दोनों घुटने टेककर प्रणाम किया।
जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥
पवनपुत्र को जाते देवताओं ने देखा। वे उनका बल और विशेष बुद्धि परखना चाहते थे।
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥
अहियों की माता सुरसा नाम की राक्षसी को भेजा। वह आकर हनुमान जी से बोली।
आयेसु मोर सुनु हनुमंता। पैठेहु जो सीतहि देखंता॥
सुरसा बोली — हे हनुमान! मेरी आज्ञा सुनो। सीता जी को देखने के लिए जो गया — उसे मैं खाऊंगी।
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥
उसने एक योजन मुंह फैलाया, हनुमान जी ने शरीर दुगुना किया।
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥
उसने सोलह योजन का मुंह बना लिया, तुरंत पवनसुत बत्तीस योजन हो गए।
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥
जैसे-जैसे सुरसा मुंह बढ़ाती, हनुमान जी दुगुना रूप दिखाते।
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥
उसने सौ योजन का मुंह बना लिया। पवनसुत ने अत्यंत छोटा रूप धारण किया।
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
हनुमान जी मुंह में घुसे और फिर बाहर आ गए। उसे सिर नवाकर विदा माँगा।
📃 सर्ग २ — लंका दर्शन एवं लंकिनी वध
निसिचरि एक सिंधु महँ रहई। करि माया नभु के खग गहई॥
समुद्र में एक राक्षसी रहती थी। वह माया से आकाश के पक्षियों को पकड़ती थी।
जीव जंतु जे গগन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥
जो जीव-जंतु आकाश में उड़ते, जल में उनकी परछाईं देखती।
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा গগनचर खाई॥
छाया पकड़ते ही वे उड़ नहीं सकते — इस प्रकार वह सदा গগनविहारियों को खाती थी।
सो छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपाट सुत बध कीन्हा॥
उसने हनुमान जी के साथ वह छल किया। हनुमान जी ने उसके पुत्र का वध किया।
लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥
लंका राक्षसों के समूह का निवास है। यहाँ सज्जन का वास कहाँ?
मन महुँ तरक करइ कपि लागा। महावीर हनुमंत अभागा॥
हनुमान जी मन में तर्क करने लगे — महावीर हनुमान, अभागे तो नहीं?
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदर। चउहट हट सुबरन बहु मंदर॥
सोने का किला — विचित्र मणियों से बना सुन्दर। चौहट्टे, बाजार — सुन्दर और बहुत से मंदिर।
गज रथ खच्चर बाजि बहु मेला। नानाकार निसाचर खेला॥
हाथी, रथ, खच्चर, घोड़े — बहुत से जमावड़े। अनेक प्रकार के राक्षसों का खेल।
बन बाग उपवन वाटिका सर कूप बापी। नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप छापी॥
वन, बाग, उपवन, वाटिका, तालाब, कुएं, बावड़ी। मनुष्य, नाग, देव, गंधर्व की कन्याएं — रूप में छाप लिए।
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अति बल। कहुँ द्विज रूप धरैं कहुँ तपसी कहुँ बटु पल॥
कहीं भारी देह — पर्वत समान अत्यंत बलवान। कहीं ब्राह्मण रूप धरे, कहीं तपस्वी, कहीं ब्रह्मचारी।
निज बल उत्तर दिए उन्हें। जब हरि हित तन तजउँ॥
हनुमान जी ने अपनी शक्ति का परिचय दिया — प्रभु के कार्य में विश्राम नहीं।
चलत महाजलधि लहरि अस उठहिं। कपि बूड़े जहाँ तहाँ पर्बत जुझहिं॥
चलते समय महासागर में लहरें ऐसी उठती हैं। जहाँ-तहाँ पर्वत भिड़ते हैं।
📃 सर्ग ३ — माता सीता दर्शन
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥
हनुमान जी ने माता सीता को देखकर मन ही मन प्रणाम किया। रात्रि के पहर बीतते जा रहे थे।
तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥
पेड़ के पत्तों में छुपकर रहे। विचार करते हैं — भाई, क्या करूं?
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा॥
उसी अवसर पर रावण वहाँ आया — साथ में बहुत सी नारियाँ सजाकर लाया।
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥
दुष्ट रावण ने बहुत प्रकार से सीता जी को समझाया — साम, दान, भय और भेद दिखाया।
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी॥
रावण ने कहा — हे सुंदरी! सयानी! सुनो — मंदोदरी आदि सभी रानियाँ।
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥
तुम्हारी सेविका बना दूंगा — यह मेरी प्रतिज्ञा है। एक बार मेरी ओर देखो।
सुनत बचन पुनि मारग जोई। मुनि उपदेश न मानइ कोई॥
वचन सुनकर फिर मार्ग ढूंढती हैं — मुनि का उपदेश कोई नहीं मानता।
तृन धरि ओट कहति वैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥
तिनके की ओट रखकर वैदेही बोलीं — अयोध्यापति परम स्नेही का स्मरण करके।
सुन दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥
हे दशमुख! सुनो — जुगनू के प्रकाश से कभी कमलिनी खिलती है?
अस अभिमान जनि करहु मोसों। चाहत मोहि तजहु भव भ्रमण॥
ऐसा अभिमान मुझसे मत करो — मुझे चाहते हो तो भव-भ्रमण छोड़ो।
📃 सर्ग ४ — हनुमान-सीता संवाद एवं अक्षय कुमार वध
हनूमान तब नीचे आए। सुंदर रूप बहुत सुख पाए॥
हनुमान जी तब नीचे आए। सुन्दर रूप देखकर बहुत सुख पाया।
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥
हे माता जानकी! मैं राम दूत हूं। करुणानिधान की सच्ची शपथ।
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सनमानी॥
हे माता! यह मुद्रिका मैं लाया हूं। राम ने आपके लिए सम्मान के साथ दी है।
नाथ बियोगिनि बिरहँ जराऊँ। जिमि हिम उदय सरद रितु पाऊँ॥
नाथ के वियोग में विरह से जल रही हूं — जैसे ओस के स्पर्श से शरद ऋतु में (कमल जल जाए)।
बिनती प्रभु मोरि सुनहु मन लाई। जानु जानकी नाम गुन गाई॥
हे प्रभु! मेरी विनती मन लगाकर सुनिए। जानकी के नाम-गुण गाकर जानो।
त्रिजटा सखि राखहुँ पायन परी। नाम सुनत जानकिहि अति सुख भई॥
त्रिजटा सखि ने पैरों में पड़कर रखा। राम का नाम सुनकर जानकी जी को अति सुख हुआ।
जौं रघुबीर होहि मन माही। मोर बचन सुनु सीता तब जाही॥
यदि रघुवीर मन में हों तो हे सीता! मेरा वचन सुनो — तब जाओ।
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥
हनुमान जी ने कहा — हे प्रभु! वही विपत्ति है जब आपका स्मरण-भजन न हो।
📃 सर्ग ५ — रावण दरबार एवं लंका दहन
सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया॥
हे रावण! सुनो — ब्रह्मांड का समूह जिनके बल से माया ने बनाया है।
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा॥
हे दस सिर वाले! जिनके बल से ब्रह्मा, हरि, शिव — पालते, रचते और हरते हैं।
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरिकानन॥
जिनके बल से सहस्रमुख (शेषनाग) पर्वत और वन सहित अंडकोश को सिर पर धारण करते हैं।
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठ सिव बिरंचि बिधाता॥
जो देवताओं की रक्षा के लिए अनेक रूप धारण करते हैं — हे शठ! शिव, ब्रह्मा उनके विधाता हैं।
बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥
राम — रघुवर के नाम को वंदन करता हूं। वह अग्नि, सूर्य और चंद्रमा का कारण है।
बिधि हरि हर मय देह तुम्हारी। सनमुख होहि न कतहुँ तुम्हारी॥
आपकी देह ब्रह्मा, हरि, हर से बनी है — परंतु कहीं सामने नहीं आते।
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनय तुम्हारे॥
जिन्होंने मुझ पर प्रहार किया, मैंने उन्हें मारा। फिर तुम्हारे पुत्र ने मुझे बांधा।
नाथ दासगति तुम्ह जानी। जारिहि लंका अकास बानी॥
हे नाथ! दास की गति तुमने जानी — आकाशवाणी ने कहा — लंका जलेगी।
📃 सर्ग ६ — लंका दहन के बाद वापसी
हरि प्रेरित तेहि अवसर चली। मुठिका एक कपिहि कारि दली॥
हरि प्रेरणा से उस अवसर पर चली। एक मुट्ठी से कपि को दबाया।
पुनि निज रूप धरे हनुमाना। देखि बिहँस राम रघुराना॥
फिर हनुमान जी ने अपना रूप धारण किया। देखकर रघुराना राम हँसे।
जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कवि उर अजर नचावहिं बानी॥
जिस पर जानकर कृपा करते हैं — कवि के हृदय में अजर वाणी नचाते हैं।
तहँ सुंदरि बाटिका सुहाई। सागर तरु नाना बहु छाई॥
वहाँ सुन्दरी वाटिका सुहावनी — सागर के किनारे अनेक प्रकार के वृक्षों की छाया।
लंका जारि समुद्र महुँ बोरी। सकुसल राम पद नावेउ सीसा॥
लंका को जलाकर समुद्र में डुबोकर — सकुशल राम के चरणों में सिर नवाया।
जय हनुमान ज्ञान गुण सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
जय हनुमान — ज्ञान और गुण के सागर! जय कपीश — तीनों लोकों को उजागर करने वाले!
📃 सर्ग ७ — राम-मिलन और समापन
नाथ परंतु सुनहु मन मांही। बहुत समाचार देत मोहि आही॥
हे नाथ! परंतु मन में सुनो — बहुत समाचार देने को मन आ रहा है।
देखी सिया सुधि पाई। कहि गुन सील छबि पाई॥
सीता जी की सुधि पाई। गुण, शील और छवि कहकर पाई।
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
सभी संकट कटते हैं, सभी पीड़ाएं मिटती हैं — जो बलवीर हनुमान जी का स्मरण करता है।
जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
जय जय जय हनुमान गोसाईं — गुरुदेव की भाँति कृपा करो।
जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहिं बंदि महा सुख होई॥
जो सौ बार पाठ करे — बंधन छूटते हैं, महा सुख होता है।
जो यह पढ़इ हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
जो हनुमान चालीसा पढ़े — शिव जी साक्षी, सिद्धि होती है।