बालकाण्ड — परिचय
श्री रामचरितमानस का प्रथम एवं सर्वाधिक विस्तृत काण्ड "बालकाण्ड" है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस काण्ड की रचना संवत् १६३१ (ई. सन् १५७४) में की थी। इस काण्ड में सृष्टि की उत्पत्ति, देवताओं की स्तुति, शिव-पार्वती के दिव्य विवाह से लेकर भगवान श्री राम के जन्म, उनके बाल्यकाल और अंत में सीता-राम विवाह का अत्यंत मनोरम वर्णन है।
यह काण्ड मंगलाचरण से प्रारंभ होता है। कवि ने गणेश जी, सरस्वती माँ, शिव-पार्वती, और अपने गुरु की वंदना की है। काण्ड में दो मुख्य संवाद हैं — याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद और शिव-पार्वती संवाद, जिनके माध्यम से रामकथा प्रारंभ होती है।
वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥
अर्थ : वर्णों, अर्थ-समूहों, रसों, छंदों और मंगलों के कर्ता माँ सरस्वती और गणेश जी की मैं वंदना करता हूँ।
बालकाण्ड में तुलसीदास जी ने भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के अनेक उपदेश दिए हैं। इस काण्ड की भाषा अवधी है और इसमें दोहा, चौपाई, छंद, सोरठे — सभी प्रकार के काव्य-रूपों का सुंदर प्रयोग हुआ है।
कथा संक्षेप
बालकाण्ड में अनेक उपकथाएं और प्रसंग समाहित हैं जो भगवान राम के अवतार की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं —
गोस्वामी तुलसीदास जी ने गणेश जी, सरस्वती माँ, शिव-पार्वती, राम-सीता और संतों की वंदना से ग्रंथ का शुभारंभ किया। याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद के माध्यम से रामकथा की पृष्ठभूमि तैयार की।
भगवान शिव ने पार्वती जी को रामकथा सुनाई। सती ने राम की परीक्षा ली जिससे शिव-सती में वैराग्य हुआ। सती के प्राण त्याग के बाद पार्वती जी के रूप में पुनर्जन्म हुआ।
पार्वती जी ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की। शिव जी ने सप्त ऋषियों को भेजकर परीक्षा ली। फिर स्वयं ब्राह्मण वेश में आए और अंततः उनसे विवाह किया।
जय-विजय का कुमति की वजह से ऋषि श्राप, रावण रूप में जन्म और लंका पर आधिपत्य। रावण के अत्याचारों से पृथ्वी त्राहि-त्राहि करने लगी।
पृथ्वी माता गो-ब्राह्मण वेश में भगवान विष्णु के पास गईं। सभी देवताओं ने मिलकर भगवान विष्णु से रावण वध और पृथ्वी रक्षा की प्रार्थना की। विष्णु जी ने मनुष्य रूप में अवतार लेने का वचन दिया।
राजा दशरथ ने महर्षि श्रृंगी के नेतृत्व में पुत्रेष्टि यज्ञ किया। यज्ञ से प्राप्त खीर का प्रसाद तीनों रानियों — कौसल्या, कैकेयी और सुमित्रा — को दिया गया।
चैत्र शुक्ल नवमी (रामनवमी) को भगवान श्री राम का जन्म हुआ। तत्पश्चात् भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का भी जन्म हुआ। पूरी अयोध्या में आनंद छा गया।
विश्वामित्र मुनि की प्रार्थना पर राम-लक्ष्मण उनके साथ गए। ताड़का वध, मारीच-सुबाहु का संहार और अहिल्या उद्धार — ये सभी प्रमुख घटनाएं हुईं।
जनकपुर में सीता स्वयंवर। राजा जनक की प्रतिज्ञा — जो शिव धनुष को तोड़े वही सीता का वर। भगवान राम ने एक ही हाथ से धनुष तोड़ दिया। सीता माता ने राम के गले में वरमाला डाली।
धनुष टूटने की ध्वनि से परशुराम जी आए। उनका क्रोध शांत करने हेतु राम ने विनम्रता से उत्तर दिया। परशुराम ने राम में विष्णु का तेज देखा और शांत हो गए।
राम-सीता, भरत-मांडवी, लक्ष्मण-उर्मिला और शत्रुघ्न-श्रुतकीर्ति का शुभ विवाह हुआ। पूरे जनकपुर में उत्सव का माहौल। विवाह के बाद बारात अयोध्या लौटी।
मुख्य चौपाइयाँ और दोहे
मंगल भवन अमंगल हारी।
द्रवहु सु दसरथ अजिर बिहारी॥
अर्थ : जो मंगल के भवन हैं और अमंगल को हरने वाले हैं, जो दशरथ जी के आंगन में विहार किया करते थे — वे भगवान राम प्रसन्न हों और कृपा करें।
बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥
अर्थ : मैं उन गुरुदेव के चरण-कमल की वंदना करता हूँ जो कृपा के सागर और मनुष्य रूप में भगवान हैं। उनके वचन महामोह रूपी अंधकार को नष्ट करने के लिए सूर्य की किरणों के समान हैं।
भए प्रकट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥
अर्थ : कृपालु, दीनदयालु और कौसल्या के हित कारण प्रभु प्रकट हुए। माता कौसल्या हर्षित हो गईं और मुनियों के मन को मोह लेने वाले उनके अद्भुत रूप को निहारने लगीं।
रघुकुल रीति सदा चली आई।
प्राण जाहुँ बरु बचन न जाई॥
अर्थ : रघुकुल की यह रीति सदा से चली आई है — प्राण चले जाएं परन्तु वचन न जाए। यह दोहा सत्य और वचन-पालन का सर्वोच्च उदाहरण है।
सिय सुंदरता बरनि न जाई।
लघु मति बहुत मनोहरताई॥
आवत देखि लोग सब ठाढ़े।
मन प्रसन्न नयन नहिं अघाढ़े॥
अर्थ : सीता जी की सुंदरता का वर्णन नहीं किया जा सकता। मेरी बुद्धि बहुत छोटी है और उनकी मनोहरता बहुत अधिक है। उन्हें आते देखकर सभी लोग खड़े हो गए। मन प्रसन्न हो गया और नेत्र तृप्त नहीं हुए।
होइहि सोइ जो राम रचि राखा।
को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
अर्थ : वही होगा जो राम ने रच कर रखा है। कोई तर्क करके शाखाएं क्यों बढ़ाता है? ईश्वर की इच्छा के आगे मनुष्य का तर्क व्यर्थ है।
मुख्य पात्र
बालकाण्ड का संदेश
बालकाण्ड हमें सिखाता है कि ईश्वर का जन्म तब होता है जब पृथ्वी पर पाप और अत्याचार बढ़ जाते हैं। भगवान राम का अवतरण संसार में धर्म की पुनर्स्थापना के लिए हुआ था।
राम का बाल्यरूप यह दर्शाता है कि ईश्वर भी मनुष्य की तरह जन्म लेते हैं, खेलते हैं, पढ़ते हैं और कर्तव्य निभाते हैं। "रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाहुँ बरु बचन न जाई" — यह जीवन का सबसे बड़ा संदेश है।
राम-सीता विवाह यह सिखाता है कि वीरता और योग्यता ही जीवन की कुंजी है। सीता स्वयंवर में भगवान राम ने शिव धनुष तोड़कर यह सिद्ध किया कि वे सर्वश्रेष्ठ हैं।
सकल पदारथ एहि जग माहीं।
करमहीन नर पावत नाहीं॥
अर्थ : इस जग में सभी वस्तुएं हैं, परन्तु कर्महीन (आलसी) व्यक्ति को कुछ प्राप्त नहीं होता। कर्म किए बिना कोई फल नहीं मिलता — यही बालकाण्ड का मूल संदेश है।