🔱 शिव स्तुति — परिचय
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने भगवान शिव की अनेक सुंदर स्तुतियाँ लिखी हैं। शिव जी स्वयं राम के परम भक्त हैं और राम नाम का जाप करते हैं। इनकी वंदना से शीघ्र कल्याण होता है।
शिवद्रोही मम दास कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा॥
जो शिव का द्रोही होकर मेरा दास कहलाता है — वह मनुष्य स्वप्न में भी मुझे नहीं पा सकता। — श्री राम
📃 शिव वंदना — रामचरितमानस
बालकाण्ड — शिव वंदना
जय जय गिरिवर राज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी॥ जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता॥
हे पर्वतराज की किशोरी (पार्वती)! जय-जय। हे महेश के मुख रूपी चंद्र की चकोरी! जय! हे गजानन और षडानन की माता! जगत-जननी, बिजली जैसी देह वाली — जय!
नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेद नहिं जाना॥ भव भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥
आपका आदि, मध्य और अंत नहीं है। अमित प्रभाव को वेद भी नहीं जान पाए। भव, विभव और पराभव की कारण, जगत को मोहित करने वाली, स्वतंत्र विहार करने वाली।
पतिदेवता सुतीय महँ मातु प्रथम तव रेख। महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष॥
पतिव्रता स्त्रियों में हे माता! आप प्रथम हैं। हजारों शारदा और शेषनाग भी आपकी अमित महिमा नहीं कह सकते।
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रुद्राष्टक — शिव महिमा
नमामीशमीशान निर्वाण रूपं विभुं व्यापकं ब्रह्म वेद स्वरूपम्। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम्॥
मैं ईशान (ईश्वर), निर्वाण रूप, विभु, व्यापक, ब्रह्म स्वरूप का नमन करता हूं। निज, निर्गुण, निर्विकल्प, निरीह — चिदाकाश और आकाशवास का भजन करता हूं।
निराकार मोंकार मूलं तुरीयं गिराज्ञान गोतीत मीशं गिरीशम्। करालं महाकाल कालं कृपालं गुणागार संसारपारं नतोऽहम्॥
निराकार, ओंकार मूल, तुरीय, वाणी और ज्ञान से अतीत, गिरीश, करालं, महाकाल, कालस्वरूप, कृपालु — गुणागार, संसारपार को नमन।
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्। स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥
हिमाचल जैसे गोरे, गंभीर, करोड़ कामदेवों की प्रभा वाले शरीर। सिर पर कल्लोलिनी (लहरदार) सुंदर गंगा, माथे पर बाल-चंद्र और गले में सर्प धारण किए।
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्। मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥
हिलते कुंडल, सुंदर भौंहें, विशाल नेत्र, प्रसन्न मुख, नीलकंठ, दयालु। मृगेश की खाल के वस्त्र, मुंडमाला — प्रिय शंकर, सर्वनाथ का भजन करता हूं।
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम्। त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानी पतिं भाव गम्यम्॥
प्रचंड, प्रकृष्ट, प्रगल्भ, परमेश, अखंड, अज, करोड़ सूर्यों के प्रकाश वाले। तीनों तापों को निर्मूल करने वाले शूलपाणि — भवानी पति, भाव से प्राप्त होने वाले का भजन करता हूं।
कलातीत कल्याण कल्पान्त कारी सदा सज्जनानन्द दाता पुरारी। चिदानन्द संदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥
कलातीत, कल्याणस्वरूप, कल्पांत के कारण, सदा सज्जनों को आनंद देने वाले पुरारी। चिदानंद के पुंज, मोह हरने वाले — हे मनमथारी प्रभु! प्रसन्न होइए।
न यावद्उमानाथ पादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्। न तावत्सुखं शान्तिसंताप नाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम्॥
जब तक मनुष्य इस लोक या परलोक में उमानाथ के चरण-कमल का भजन नहीं करते — तब तक सुख, शांति और संताप-नाश नहीं होता। हे प्रभु! सर्वभूत-वासी, प्रसन्न होइए।
न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम्। जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो॥
मैं न योग जानता हूं, न जप, न पूजा — हे शंभु! मैं सदा-सर्वदा आपको नमन करता हूं। जरा, जन्म और दुखों से तप रहे मुझे — हे प्रभु, हे ईश, हे शंभो! रक्षा करें।
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