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श्री रामचरितमानस

मानस स्तुति

Manas Stuti — Divine Praises of Lord Shri Ramchandraji by Celestial Beings

📿

मानस स्तुति क्या है?

श्री रामचरितमानस में भगवान श्री रामचंद्र जी की स्तुतियाँ विभिन्न देव-गण, ऋषि-मुनि एवं उनकी माता कौसल्या जी ने की हैं। ये स्तुतियाँ प्रभु राम के दिव्य स्वरूप, गुण और महिमा का वर्णन करती हैं। इनका नित्य पाठ करने से हृदय में भक्ति का संचार होता है तथा प्रभु की अनुकम्पा प्राप्त होती है।

जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।
— ब्रह्मा जी एवं देवताओं की स्तुति | श्री रामचरितमानस

ब्रह्मा जी एवं देव-गणों की स्तुति

Stuti by Lord Brahmaji and Celestial Beings

जब भगवान श्री विष्णु ने राजा दशरथ के पुत्र के रूप में अवतार लेने का निश्चय किया, तब ब्रह्मा जी के नेतृत्व में सभी देवता एवं स्वर्गीय प्राणियों ने मिलकर प्रभु की यह अनुपम स्तुति की। यह स्तुति प्रभु के अनंत गुणों, उनकी सर्वव्यापकता और जगत के पालन-पोषण की अद्भुत भूमिका का सुंदर वर्णन करती है।

॥१॥
जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।
गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता॥
पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई।
जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई॥
भावार्थ: हे देवराज, भक्तों को सुख देने वाले, शरणागतों की रक्षा करने वाले भगवान! आपकी जय हो। हे गो-ब्राह्मण के हितकारी, असुरों के शत्रु, लक्ष्मी जी के प्रिय पति! आपकी जय हो। देवताओं और पृथ्वी का पालन करना, यह आपकी अद्भुत लीला है जिसका रहस्य कोई नहीं जानता। जो स्वभाव से ही कृपालु एवं दीनों पर दया करने वाले हैं, वे प्रभु हम पर अनुग्रह करें।
॥२॥
जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा।
अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा॥
जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिबृंदा।
निसि बासर ध्यावहिं गुन गन गावहिं जयति सच्चिदानंदा॥
भावार्थ: हे अविनाशी, सब हृदयों में वास करने वाले, सर्वव्यापक परमानन्द स्वरूप! आपकी जय हो। हे अगम्य, इन्द्रियों से परे, पवित्र चरित्र वाले, माया से रहित मुकुन्द! मोहरहित वैरागी मुनि-मण्डल जिनके लिए अत्यन्त प्रेम से रात-दिन ध्यान करते हैं और गुणों का गान करते हैं — उन सच्चिदानन्द की जय हो।
॥३॥
जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा।
सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा॥
जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा।
मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुरजूथा॥
भावार्थ: जिन्होंने बिना किसी सहायक के तीन प्रकार की सृष्टि रची, वे पापों के नाशक प्रभु हमारी चिन्ता करें — हम भक्ति और पूजा भले न जानते हों। जो संसार के भय को नष्ट करने वाले, मुनियों के मन को प्रसन्न करने वाले और विपत्तियों के समूह का नाश करने वाले हैं, सम्पूर्ण देव-समूह चतुराई छोड़कर मन, वचन और कर्म से उनकी शरण लेता है।
॥४॥
सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहिं जाना।
जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना॥
भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा।
मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा॥
भावार्थ: सरस्वती, वेद, शेषनाग एवं समस्त ऋषि जिन्हें नहीं जान पाए, जिन्हें दीन प्रिय हैं — ऐसा वेद पुकारकर कहते हैं — वे श्रीभगवान द्रवित हों। संसार-सागर को मथने वाले मन्दराचल के समान, सब प्रकार से सुन्दर, गुणों के धाम, सुखों के समूह प्रभु के चरण-कमलों में मुनि, सिद्ध और समस्त देव — परम भयभीत होकर — नमस्कार कर रहे हैं।

माता कौसल्या जी की स्तुति

Stuti by Mother Kaushalyaji — At the Birth of Lord Shri Ramchandraji

जब चतुर्भुज रूप में प्रभु श्री राम माता कौसल्या के गर्भ से प्रकट हुए, तब माँ का हृदय आनन्द और विस्मय से भर गया। उन्होंने भावविभोर होकर अपने नवजात पुत्र के उस दिव्य स्वरूप की स्तुति की — एक माँ का प्रेम और एक भक्त की श्रद्धा दोनों एक साथ अभिव्यक्त हुए।

॥१॥
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुजचारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥
भावार्थ: कृपालु, दीनदयालु, कौसल्या के हितकारी प्रभु प्रकट हुए। माता हर्षित हो उठीं — प्रभु का अद्भुत रूप देखकर मुनियों का भी मन मोहित हो जाए। नेत्रों को सुख देने वाले, मेघ के समान श्याम शरीर, चारों भुजाओं में अपने आयुध लिए, भूषण और वनमाला धारण किए, विशाल नेत्रों वाले, शोभा के सागर खरारि (राक्षसों के शत्रु राम) प्रकट हुए।
॥२॥
कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता॥
करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता॥
भावार्थ: माता ने दोनों हाथ जोड़कर कहा — हे अनन्त! मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? वेद और पुराण कहते हैं कि आप माया, गुण और ज्ञान से परे तथा अमान हैं। जो करुणा और सुख के सागर, सब गुणों के भंडार हैं, जिन्हें वेद और संत गाते हैं — वे लक्ष्मीपति मेरे हित के लिए भक्तों पर प्रेम करने वाले बनकर प्रकट हुए।
॥३॥
ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै॥
उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥
भावार्थ: वेद कहते हैं कि जिनके प्रत्येक रोम में माया-निर्मित ब्रह्मांडों के समूह हैं, वे मेरे हृदय में निवास करते हैं — यह अचरज सुनकर धैर्यवान व्यक्ति का मन भी स्थिर नहीं रह सकता। जब ज्ञान उत्पन्न हुआ, प्रभु मुस्कुराए और अनेक प्रकार की बाल-लीलाएँ करने की इच्छा से उन्होंने सुंदर कथा कहकर माता को समझाया ताकि उन्हें पुत्र का प्रेम प्राप्त हो।
॥४॥
माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा॥
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा॥
भावार्थ: माता ने फिर कहा — हे तात! यह रूप त्याग दीजिए; बाल-लीलाएँ कीजिए, जो अत्यन्त प्रिय स्वभाव वाली हैं — यह सुख अनुपम है। देवाधिपति प्रभु ने यह सुनकर बालक बनकर रोना आरंभ किया। जो इस चरित को गाते हैं वे भगवान के पद को प्राप्त होते हैं और संसार के कुएँ में नहीं गिरते।
॥ दोहा ॥
बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥
ब्राह्मण, गो, देव और संतों की रक्षा के लिए प्रभु ने मनुष्य रूप में अवतार लिया — उनका शरीर अपनी इच्छा से निर्मित था, माया और गुणों से परे।

अहल्या जी की स्तुति

Stuti by Ahalyaji — Blessed by the divine touch of Lord Ram's feet

गौतम मुनि के श्राप से शिला बनी अहल्या जी का उद्धार प्रभु श्री राम के चरण-स्पर्श से हुआ। शुद्ध हृदय से प्रभु के सामने खड़ी होकर उन्होंने यह अत्यंत मार्मिक स्तुति की। यह स्तुति शरणागति, विनम्रता और सच्ची भक्ति का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।

॥१॥
परसत पद पावन सोकनसावन प्रगट भई तपपुंज सही।
देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही॥
अति प्रेम अधीरा पुलक शरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही।
अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही॥
भावार्थ: पवित्र और शोक-नाशक चरणों के स्पर्श से तपस्या की सच्ची मूर्ति अहल्या प्रकट हो गईं। रघुनाथ जी को देखकर वे सामने खड़ी होकर हाथ जोड़ने लगीं। अत्यंत प्रेम के कारण अधीर हो गईं, शरीर पुलकित हो गया, मुँह से बचन नहीं निकला। अत्यन्त बड़भागी अहल्या चरणों में लग गईं और दोनों नेत्रों से अश्रु-धारा बह चली।
॥२॥
धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई।
अति निर्मल बानी अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई॥
मैं नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई।
राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई॥
भावार्थ: मन में धैर्य धारण किया, प्रभु को पहचाना — रघुपति की कृपा से भक्ति पाई। अत्यन्त निर्मल वाणी से स्तुति आरंभ की — हे ज्ञान से प्राप्त होने वाले रघुराज! आपकी जय हो। मैं नारी हूँ, अपवित्र हूँ — प्रभु जगत को पावन करने वाले, रावण के शत्रु, भक्तों को सुख देने वाले हैं। हे कमल-नयन, संसार के भय से मुक्त करने वाले! मैं शरण में आई हूँ — रक्षा कीजिए।
॥३॥
मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना।
देखेउँ भरि लोचन हरि भव मोचन इहइ लाभ संकर जाना॥
बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना।
पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना॥
भावार्थ: मुनि ने जो श्राप दिया, वह बहुत भला किया — मैंने इसे परम अनुग्रह माना। नेत्र भरकर हरि को देखा जो भव-बन्धन से मुक्त करते हैं — यही लाभ शंकर जी ने बताया था। हे नाथ! मेरी विनती है — मैं सरल बुद्धि हूँ, मैं और कोई वर नहीं माँगती। बस यही माँगती हूँ कि मेरा मन भ्रमर बनकर आपके चरण-कमलों की परागरूपी रस में अनुरक्त रहे।
मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुरजूथा॥
मन, वचन और कर्म से चतुराई छोड़कर प्रभु की शरण लें — यही मानस स्तुति का सन्देश है
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